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कवर स्टोरी


कवर स्टोरी


Posted By: Ameeta  |  Posted Date: 02-10-2025

   धीरे-धीरे ही सही लेकिन अब भारत का किसान भी लगातार बदल रहा है। अब किसान खेती से सिर्फ भावनात्मक लगाव ही नहीं रखता बल्कि अब वह खेती को अपनी आय और जीविका का शानदार जरिया बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। किसी हद तक इस उद्देश्य की भरपाई कर रहा है, ‘एक खेत, कई फसल’ का उर्वर मॉडल। आज यह सिर्फ नई सोचभर नहीं है बल्कि मौजूदा समय की जरूरत भी है। क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के चलते पारंपरिक मौसम और जलवायु में व्यापक परिवर्तन अब आशंका का सवाल नहीं है बल्कि वह साफ-साफ दिखने लगा है। मौसम लगातार अनिश्चित हो रहा है, खेती की लागत पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा बढ़ गई है और बाजार में उत्पादन की भरमार के कारण कभी भी कीमतों का उतार-चढ़ाव किसान की आय का सारा गणित गड़बड़ा देता है। ऐसे में यह एक वैज्ञानिक सोच है कि अगर खेत से हमें सालभर के लिए आमदनी चाहिए, तो सालभर खेत में कुछ करना भी चाहिए। सिर्फ एक पारंपरिक फसल से कहां आज की जरूरतें पूरी हो सकती हैं। यही कारण है कि आज बहुत तेजी से सिर्फ अपने यहां नहीं, पूरी दुनिया में एक खेत, कई फसल मॉडल बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इस समय पूरी दुनिया में करीब-करीब 40 देश हैं, जहां इस मॉडल को अपनाया गया है और शानदार बात ये है कि इनमें से किसी भी देश का अनुभव निराशाजनक नहीं रहा। हर देश में इस मॉडल से अपनी आय और उत्पादन को पहले से कहीं बेहतर किया है।

   यही कारण है कि अब भारत में भी तेजी से यह कृषि मॉडल अपनाया जा रहा है। इसके लिए हर जरूरी शर्त किसान अपना रहे हैं। राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा के झज्झर जिले में मलिकपुर गांव के विनय अभी कुछ दिनों तक खेती को एक बोझ की तरह महसूस कर रहे थे। लेकिन तीन एकड़ के मालिक विनय ने दो साल पहले ‘एक खेत, कई फसल’ मॉडल को अपनाया और आज उनकी आमदनी 11 लाख रुपये सालाना से भी ज्यादा हो गई है। विनय ने मधुमक्खी पालन के साथ-साथ कम समय की विभिन्न फसलों, बागवानी तथा अन्य गतिविधियों में खुद को लगाया और आज वह भारत सरकार में कृषि नवाचार की एक केस स्टडी के रूप में दर्ज हैं; क्योंकि दो सालों में उनकी आय 116 फीसदी तक बढ़ गई है। कुछ ऐसी ही कामयाबी बिहार में मुंगेर की बीना देवी के खाते में भी दर्ज है। मुंगेर क्षेत्र के तिलकारी गांव की रहने वाली बीना देवी ने अपनी पहचान मशरूम उत्पादन से बनायी है। साथ ही महिलाओं को कृषि प्रशिक्षण दिया और आज खुद कामयाब किसानों के लिए एक कामयाब कहानी के रूप में मौजूद हैं। उन्होंने मशरूम, वर्मी कंपोस्ट, ऑर्गेनिक खेती, इन तीनों को एक साथ जोड़कर किया और अपनी आय को कई गुना ज्यादा बढ़ा लिया। 

    ..तो ऐसी ही एक कहानी कर्नाटक के हासन जिला के किसान भूपालक्ष की है। इन्होंने मधुमक्खी पालन को अपनी पारंपरिक कृषि के साथ जोड़ा और शहद उत्पादन से अपनी आय डेढ़ से दो लाख रुपये प्रति छमाही बढ़ा लिया। अब ये खेती के साथ मधुमक्खी पालन के जरिये शहद का उत्पादन तो करते ही हैं, अपने ही तरह के कई और किसानों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। दरअसल भारत में एक खेत, कई फसल मॉडल दुनिया के किसी दूसरे देश के मुकाबले कहीं ज्यादा उपयोगी है। क्योंकि भारत में करीब 14-15 करोड़ किसान हैं, जिनमें से 85 से 90 फीसदी तक किसान छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। इन किसानों के लिए यह मॉडल सबसे ज्यादा उपयोगी है। पिछले कुछ सालों में अब तक 15 से 25 फीसदी तक किसानों ने इस मॉडल की तरफ अपने कदम बढ़ाये हैं और नतीजा सामने है कि इनकी आय पारंपरिक किसानों के मुकाबले 150 से 200 फीसदी तक बढ़ी है और आज ये किसान दूसरे किसानों के सामने मॉडल के रूप में मौजूद हैं। जैसे कि हमने ऊपर तीन किसानों के बारे में बताया। देश के कुल किसानों में से ये 15 से 25 फीसदी तक ये वो किसान हैं, जो खेती करने के साथ-साथ डेयरी क्षेत्र में भी सक्रिय तथा पशु पालन का भी काम करते हैं और यह पशु पालन पारंपरिक रूप से पशुओं को चरानाभर नहीं है बल्कि उन्हें विभिन्न डेयरी उत्पादों के काम के लिए पालना है। 

    इसी तरह कुछ किसान खेती करने के साथ-साथ सब्जी, फलों की खेती भी करते हैं तथा कुछ खेती के साथ-साथ मधुमक्खी, मशरूम और मछली पालने का भी काम करते हैं, जिससे उनकी आय में पिछले दो से तीन सालों में 200 फीसदी तक बढ़ी है। वैज्ञानिक इस मॉडल को अपनाने के लिए किसानों को पिछले कई सालों से प्रोत्साहित कर रहे हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च के विभिन्न प्रोजेक्ट इसी पर बने हुए हैं और भारत सरकार द्वारा बनवाये जाने वाले कृषि संबंधी तमाम कार्यक्रम इसी मॉडल को प्रोत्साहित करने को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं। जिनमें किसानों के लिए इस मॉडल को डेमो के रूप में दिखाना और उन्हें हर वह जरूरी साधन उपलब्ध कराना है, चाहे वो जानकारी हो, चाहे प्रशिक्षण हो और चाहे इसके लिए आर्थिक सहायता की ही बात क्यों न हो।

    यह मॉडल तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और मजे की बात ये है कि इस मॉडल पर देश में हर जगह अलग-अलग तरीके की स्थानीय उपलब्धताओं और जरूरतों के हिसाब से काम हो रहा है। जैसे कानपुर जिले के एक गांव में जहां तकरीबन 450 किसान हैं, उनमें से 50 किसानों ने यह मॉडल अपनाया और उनकी आय में बढ़ोतरी को देखकर अब पूरे गांव के किसान इस मॉडल को अपनी-अपनी जरूरत, क्षमताओं और हैसियत के हिसाब से अपना रहे हैं। कहने की बात यह है कि भारत के करोड़ों किसानों को इस मॉडल से साफ-साफ फायदा हो रहा है। अभी भी इस मॉडल को अपनाने वाले किसानों की संख्या जो 15 से 25 फीसदी है, उनमें से भी इस मॉडल को वैज्ञानिक तरीके से अपनाने वाले किसान 8 से 10 फीसदी ही हैं। लेकिन अब इन 8 से 10 फीसदी किसानों की खुशहाली देखकर दूसरे किसान भी इस ओर आकर्षित हो रहे हैं और ऐसा स्वाभाविक ही है, जैसा कि हमने कहा, भारत से लगभग 15 करोड़ किसानों में से 12 करोड़ किसान ऐसे हैं, जो बड़ी जोत (खेती का रकबा) के मालिक नहीं है। वास्तव में यही किसान सबसे ज्यादा मॉडल से लाभान्वित हो सकते हैं और फिलहाल अच्छी बात ये है कि यही किसान इस मॉडल को अपनाने के लिए बड़ी संख्या में आगे आ रहे हैं। हालांकि यह बात भी जान लेनी है कि यह संगठित और वैज्ञानिक मॉडल वैसे बहुत नया नहीं है, लेकिन आज यह जिस संतुलित विकास का मॉडल है, वह बेहतर है।

   दरअसल यह खेती के भविष्य का मॉडल है। अब पहले की तरह पारंपरिक ढंग से सिर्फ एक बार खेत जोत कर बो देने से काम नहीं चलने वाला और किसान भी इस बात को अच्छी तरह से समझ गया है। आज का किसान सिर्फ उत्पादन नहीं करता बल्कि वह कृषि व्यावसाय में भी भागीदार है और उसे पता है कि उसके पास खेती की सीमित जमीन ही है। इसी सीमित जमीन से उसे सोना उपजाना है। इसलिए वह खेती को बिल्कुल आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से ही करके न सिर्फ अपनी आय बढ़ा सकता है बल्कि सामाजिक रूप से भी अपने को उन्नत कर सकता है। यही कारण है कि आज जिन किसानों ने इस मॉडल को अपनाया है, वो कृषि फसलों के साथ-साथ शहद, दूध, सब्जी, मशरूम जैसी तुरंत नकद फायदा देने वाली उत्पादों में भी हिस्सेदारी कर रहे हैं। यही वो रास्ता है जो भारतीय कृषि को मजबूत भी बनायेगा और लाभकारी भी। पर सवाल है इसकी शुरुआत कैसे करें? आइये कदम दर कदम इसकी कुछ शुरुआती शर्तों को जान लें-

  1. एक सुबह अचानक जगकर इस मॉडल को न अपनाएं बल्कि एक दो गतिविधियों से इसकी शुरुआत करें। जैसे मशरूम या मधुमक्खी पालन।
  2. लेकिन कुछ भी उत्पादन करने के पहले अपने स्थानीय बाजार की जरूरतों को समझें कि वहां किन चीज की जरूरत है, जिससे पैदा करके आप रातोंरात अपनी आर्थिक आय बढ़ा सकें।
  3. कुछ भी करने के लिए पहले यह जरूरी है कि विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों से जुड़ें, सरकारी योजनाओं को जानें और इनका लाभ लें। क्योंकि ये छोटे किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए ही बनायी गई हैं। 
  4. एक खेत, कई फसल का जब आइडिया दिमाग में आए और इसकी शुरुआत करना चाहें तो सबसे पहले अपने निकटवर्ती कृषि विज्ञान केंद्र जाएं और अपनी योजना वहां के कृषि वैज्ञानिकों को बताएं, वो आपके लिए अनुकूल और प्रभावी फसल के बारे में बताएंगे, जो आपको मालामाल करेगी। 
  5. इस सबके साथ ऐसी गतिविधियां चुनें जो एक दूसरे को सहायता देने वाली हो। जैसे- कुछ लोग पशु पालन करें, जो ऐसा न करने वालों के लिए भी उपयोगी साबित हो। कुछ लोग फसलें पैदा करने के बजाय फसलों के लिए जरूरी खाद, बीज वगैरह तैयार करें, तो इससे भी ज्यादा फायदा होगा। इस तरह अगर सोच, विचार करके और आधुनिक तौर तरीकों तथा वैज्ञानिकता से इस मॉडल को अपनाएंगे तो हर हाल में लाभ मिलेगा। 

­पूरी दुनिया में कामयाब है यह मॉडल


एक खेत कई आमदनी सिर्फ भारत में ही इसका उपयोग नहीं हो रहा। सच्चाई तो यह है कि दुनिया के लगभग 40 देशों में किसान इस मॉडल को अपना रहे हैं और हर जगह के किसान इससे संतुष्ट हैं, क्योंकि इस मॉडल के चलते उनकी कमाई डेढ़ से दोगुना तक बढ़ गई है। हां, यह अलग बात है कि दुनिया के जिन अलग-अलग देशों में इस मॉडल को यानी ‘एक खेत, कई फसल’ को अपनाये हैं, वह सभी जगह एक जैसा नहीं है। अलग-अलग देशों में इसके अलग-अलग रूप हैं। लेकिन नतीजा हर जगह सकारात्मक है। इस मॉडल को अपनाने से किसानों की आय में वृद्धि हुई है, जोखिम कम हुआ है और पहले के मुकाबले ये खेती ज्यादा टिकाऊ हुई है। सबसे पहले यह मॉडल एशिया के जिन तीन देशों में अपनाया गया, वो हैं चीन, वियतनाम और बांग्लादेश। इन तीनों देशों में जो बेहद सफल और आय बढ़ाने वाला प्रयोग रहा, वह धान के खेतों में, मछली और बत्तख पालन का रहा। इस तरह किसानों ने धान की फसल भी ले ली और मछली पालन भी कर दिया, जिससे उनकी अपनी भोजन की समस्या में फायदा तो हुआ ही, जरूरत से ज्यादा पैदा हो गई मछलियों को बेचने से अच्छी खासी आय भी हुई है। ठीक यही बात बत्तख पालन में भी लागू हुई और जो लाभ दुनिया को नहीं दिखता, वह यह है कि मछली और बत्तख के कारण खेतों में अत्यधिक रसायन खाद की जरूरत नहीं पड़ी। इस तरह एक पानी से ही कई उत्पादन हासिल कर लिए गए।

विशेषकर बांग्लादेश और वियतनाम के किसानों को तो काफी ज्यादा फायदा हुआ। उनके लाभ और लागत का अनुपात 1.4 से 1.58 और 2 तक पहुंच गया। ब्राजील में भी यह मॉडल अपनाया गया, जिसमें वे फसल, पशु पालन और बायो गैस तथा खाद का उत्पादन एक साथ किया गया है। इससे गरीब किसानों के लिए रोजगार मिला, आय में सुधार हुआ, पानी और संसाधनों की बचत हुई, खेती ज्यादा टिकाऊ हुई। ब्रिटेन और फ्रांस के साथ-साथ अमरीका में भी यह मॉडल कुछ हटकर अपनाया गया। अमरीका में इसे शहरी खेती के तौरपर इस्तेमाल किया गया। 

अमरीका में यह मॉडल बिल्डिंग, ग्रीन हाउस, हाइड्रोपोनिक्स के तौरपर अपनाया गया, जिससे 10 गुना पानी की बचत हुई। ट्रांसपोर्ट लागत लगभग 70 से 80 फीसदी तक कम हो गई और बीच शहर में लोगों को शुद्ध और ताजे उत्पाद मिलने से आय में ठीकठाक बढ़ोतरी हुई। अमरीका में यह मॉडल, शहरी खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण में मददगार रहा। लेकिन अगर अफ्रीका और लैटिन अमरीका में देखें तो यहां इस मॉडल को फसलों के साथ-साथ वृक्षारोपण, पशु पालन और सूखा रोधी खेती के बतौर अपनाया गया, जिसका फायदा ये मिला है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने की क्षमता बढ़ी है। आय के कई स्रोत विकसित हुए है। मिट्टी की गुणवत्ता सुधरी है और किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से कहीं ज्यादा सुरक्षा मिली है।

कुल मिलाकर अगर ‘एक खेत, कई फसल’ मॉडल को देखें तो इसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके से प्रयोग किया गया है, लेकिन सभी तरीकों से यह किसानों के लिए मददगार रहा है। अगर दुनियाभर में हुए इस प्रयोग के महत्व को साझे अनुभव के रूप में दर्ज करें तो इसका मिला-जुला निष्कर्ष यह है कि किसानों की आय में बढ़ोतरी हुई है। कई देशों में तो यह दोगुना तक या इससे ज्यादा रही है और इस तरह की आय वाले अनुभवों में भारत के किसान भी शामिल हैं। दूसरी जो महत्वपूर्ण बात इस प्रयोग के चलते देखने को मिली है, वह यह है कि इस मॉडल को अपनाने के बाद खेती में जोखिम कम हो गया है। क्योंकि अगर एक फसल फेल भी हो जाती है, तो दूसरी फसल मौजूद रहती है और वह किसी हद तक बर्बाद हुई फसल की भी भरपाई कर देती है और अगर न भी कर पायी तो एक फसल तो किसानों को मिलती ही है। 

इस मॉडल का जो तीसरा बड़ा फायदा है, वह यह है कि इसके चलते खेती की लागत में कमी आयी है। खाद, पानी कम लगे हैं और उत्पादन ज्यादा भी हुआ है, विविध भी हुआ है। इस मॉडल के अपने पर्यावरण लाभ भी हैं मसलन मिट्टी, पानी और जैव-विविधता बेहतर हुई है। पोषण में सुधार हुआ है। कुल मिलाकर एक खेत कई आमदनी मॉडल का दुनिया में जहां-जहां भी इस्तेमाल हुआ है, वह सफल रहा है। इसलिए भी व्यापक तौरपर भारतीय किसानों के लिए यह मॉडल कारगर है और भविष्य का सबसे सुरक्षित खेती का मॉडल भी है। 





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