राजेन्द्र सिंह के घर पर किसी ने खेती नहीं की। रेलवे की नौकरी करते हुए ऐसी धुन लगी कि असरावद बुजुर्ग में हर कोई उन्हें रेलवे वाले वीरजी, जैविक खेती वाले वीरजी, सोलर वाले वीरजी के नाम से जानता है। उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी। मध्य प्रदेश के रतलाम शहर में 1965 की 3 अप्रैल को जन्म हुआ। पिताजी सरदार दर्यादिनों सिंह रेलवे में मंडल यातायात निरीक्षक रहे। मां सतवंत कौर घर संभालती। 10 भाई बहनों में 8वें नंबर पर। ट्रेन से सफ़र करता तो खिड़की से ग्रामीण जनजीवन और खेतों का प्राकृतिक सौन्दर्य मुझे गहरे से आमंत्रण देता। बीएससी प्रथम वर्ष के बाद पढ़ाई छोड़ दी। 1985 में पिताजी की राह पर चलकर मैं भी रेलवे की नौकरी में लग गया। वर्ष 2000 में चंचल कौर से विवाह हुआ। बेटा गुरुबक्ष अब 16 का हो गया है। 11वीं में पढ़ रहा है।
मन खेती किसानी में : परिवार में अमूमन सभी भाई बहन सरकारी नौकरियों में थे। मेरा मन रेलवे की नौकरी से कृषि ज्ञान में ज्यादा लगता। 2003 से दूरदर्शन पर कृषि कार्यक्रम नियमित देखने लगा। ठान ली किसान ही बनना है। गुरुबक्ष के जन्म के अगले वर्ष ही इंदौर शहर के पास असरावद बुजुर्ग में कृषि भूमि खरीद शुरू हो गई। इसी के साथ शुरू हुआ कृषक जीवन की कठिन और कठोर सच्चाइयों से साक्षात्कार। सबसे पहले जीवनसाथी चंचल कौर ने 2016 में 51 वर्ष की उम्र में रेलवे के चीफ मैट्रन पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। 2016 में महेन्द्र मधुप की ‘खेतों के वैज्ञानिक’ पुस्तक पढ़ी और नवाचारी किसानों तक उपहार स्वरूप पहुंचाया। कुछ किसान वैज्ञानिकों से मिलने उनके गांव भी गया। साथ ही सुभाष पालेकर और सुभाष शर्मा से प्राकृतिक खेती सीखी। इन दिनों लोग बच्चों को खेती की जगह, नौकरी में भेजने लगे हैं। मैंने पुत्र गुरुबक्ष को किसान वैज्ञानिक बनाने का संकल्प लिया। पूर्णाहुति हुई 2022 में मेरी रेलवे सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से।
श्रमिक नहीं ‘पार्टनर’ : जैविक और प्राकृतिक खेती बहुत कुछ समझ में आने लगी थी पर सहयोगी भी तो चाहिए। उन्हें पूर्ण सम्मान देने के लिए ‘पार्टनर’ नाम दिया। हर महीने 9 हजार रुपये घर खर्च के लिए देता हूं। हम दोनों के साथ पुत्र गुरुबक्ष स्कूल से आकर खेती के काम में जुट जाता है। खेत में जैव विविधता पर हमने विशेष ध्यान दिया। विविध सब्जियों का उत्पादन ले रहे हैं। सब्जियों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए नवप्रयोग किए। तीन सौ ग्राम के प्याज की साथी किसानों और मीडिया में धूम रही। हां, बता दूं कि ईमानदारी से जैविक खेती की। खेत को रासायनिक खादों के प्रभाव से मुक्त रखवाने के लिए, शुरुआती तीन वर्षों तक उन्हें खाली रखा।
कम ऊंचाई पर मधुमक्खी छत्ता : वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. दिलीप वागेला ने इस वर्ष मई माह में हमारे खेत का निरीक्षण किया। मैंने उन्हें खेत में बांस के तने को आधार बनाकर एक फुट ऊंचाई पर छोटी जंगली मधुमक्खी का छत्ता दिखाया। मधुमक्खियां ऊंचे स्थान पर छत्ता बनाती हैं, जहां मनुष्य की सामान्य पहुंच न हो सके। डॉ. वागेला ने बधाई देते हुए कहा कि मधुमक्खियों ने पर्यावरण अनुकूलन आभास के कारण इंसानी चहल-पहल के बीच आवास बनाया। वो बोले कि इस परिवार के खेत और उसकी फसल पर मधुमक्खियों ने भरोसा जता दिया, अब आपको किसी सरकारी, गैर सरकारी प्रयोगशाला के ठप्पे की जरूरत नहीं है। इस पृष्ठभूमि में मेरी अवधारणा सुदृढ़ हो गई कि मधुमक्खियों द्वारा फैलाए गए परागकण कृषि उपज को बढ़ाते हैं। शहद तो बोनस है।
देखो, सीखो, करो : मैं कृषक परिवार में पैदा नहीं हुआ पर गुरुबक्ष तो हुआ। उसे किसान वैज्ञानिक बनाने की प्रक्रिया में जुटा हूं। उसे समझ आ गया कि पढ़ने से अधिक देखने और मंथन से समझ आती है। जो सीखा, उसे खेत पर बेहतर तरीके से कर दिखाना, इस परीक्षा में सफलता का माप है। खेत में वह छोटे बच्चों को सिखाता है। इसके वीडियो बनाकर मैं सोशल मीडिया पर डालता हूं। बकरी पालन और कुक्कुट पालन भी शुरू किया है। खेत पर 5 किलोवाट का सोलर पैनल, पेरबोलिक सोलर कुकर और सोलर ड्रायर भी लगा हुआ है। घरेलू और मित्र परिचितों के लिए शाक सब्जियों की पूर्ति के बाद सब्जियां इंदौर के ‘जैविक सेतु’ द्वारा खरीद ली जाती हैं। खेत इंदौर शहर के पास ही है पर अब वहीं रहने के लिए खेत पर ही आवास बनाने की तैयारी है।
बहुत कुछ करना है : मिशन फार्मर साइंटिस्ट परिवार से जो सीखा, उससे लगता है अभी तो शुरुआत है। कृषि मूल्य संवर्धन और खेत को कृषि पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना है। उत्पादन बढ़ने पर बिचौलिया मुक्त बिक्री व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू करना है।
सम्पर्क कर सकते हैं : राजेन्द्र सिंह, फ्लैट ए-507, कल्याण सम्पत गार्डन, बिचौली मरदाना, इन्दौर-452016 (मध्य प्रदेश), ईमेल: rajendra1965@yahoo.com मोबाइल: 8209535983