भले पहचान और परिभाषाओं में भारत हमेशा से एक कृषि प्रधान देश रहा हो लेकिन यह भी हकीकत है कि खेती पर जरूरत से ज्यादा लोगों की जीविका का दशकों से दबाव था। इसके साथ ही खेती करने के पुराने तौर-तरीकों के चलते पिछले कई दशकों से खेती सही मायनों में कराह रही थी। शायद इसलिए पिछली सदी के 70-80 और 90 के दशकों में बहुत बड़े पैमाने पर नौजवानों का गांवों से शहरों की ओर पलायन हुआ। 1970 से 2000 के बीच करीब 23 करोड़ ग्रामीण लोग शहरों की तरफ रोजी-रोटी कमाने को गये और इन 23 करोड़ लोगों में से 19 करोड़ से ज्यादा लोगों का रिश्ता खेती-किसानी वाले परिवारों से था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछली सदी के आखिरी तीन दशकों और 21वीं सदी के पहले दशक में भारत में खेती पर किस किस्म का बोझ और दबाव था। खेती पर जिस तरह से बहुत बड़ी तादाद में और ज्यादातर अकुशल जनसंख्या निर्भर थी, उसके चलते एक तरफ जहां खेती उत्पादन के मामले में बेहद पिछड़ी, वहीं दूसरी तरफ देश के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी भागीदारी लगातार कम होती गई। आजादी के समय जिस खेती की देश की अर्थव्यवस्था में भागीदारी 60 फीसदी से ज्यादा थी, 2021-22 आते-आते वह घटकर 20 फीसदी और वर्तमान में 16 से 17 फीसदी के बीच रही। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आजादी के बाद देश की अर्थव्यवस्था में दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले खेती का योगदान किस तरह कम रहा और यह कैसे धीरे-धीरे दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले पिछड़ती गई है।
लेकिन हाल के पिछले पांच-छह सालों में कृषि क्षेत्र में जबर्दस्त परिवर्तन देखने को मिल रहा है। हालांकि कृषि क्षेत्र अभी भी बहुत बड़ा क्षेत्र है और इसकी व्यापक भागीदारी तथा इसमें निर्भर लोगों की बहुत बड़ी तादाद के कारण इसमें होने वाला समग्र परिवर्तन आसानी से देखने में नहीं आता। इसके बावजूद यह भी सच्चाई है कि हाल के सालों में कृषि ने प्रगति के मामले में नई करवट ली है। अब सिर्फ यह आजीविका का साधनभर नहीं है बल्कि नई पीढ़ी के नौजवानों के लिए, नये जमाने के कॅरियर, इकोनॉमी में नयी स्टेट्स और भविष्य के सपने देखने का एक बड़ा और व्यापक नजरिया बन गई है। हजारों देश-विदेश में पढ़ रहे, अच्छे पैकेजों पर काम करने वाले हजारों प्रोफेशनल्स ने पिछले पांच साल के अंदर बड़ी संख्या में अपनी मल्टीनेशनल नौकरियों को छोड़कर खेती की तरफ लौटे हैं। इसलिए इस बात को पूरी ताकत से कहा जा सकता है कि नई पीढ़ी न सिर्फ खेती की तरफ लौटी है बल्कि अब खेती नई पीढ़ी के लिए कॅरियर, पहचान और सपना देखने का नया लैंडस्कैप भी बन गई है।
भारत में खेती अब किसानों की मजबूरी नहीं बल्कि धीरे-धीरे च्वाइस बनकर उभर रही है। क्योंकि पढ़े-लिखे कार्पोरेट दुनिया में स्थापित युवा, नई सोच, नई तकनीक और नई कल्पनशील योजनाएं लेकर जिस तरह कृषि क्षेत्र में आये हैं, उससे कृषि न सिर्फ नई तकनीक, ऑर्गनिक ट्रेंड, एग्रो स्टार्टअप और डिजिटल मार्केटिंग के लिहाज से एक आकर्षक पैकेज हो गई है बल्कि भारत में तेजी से एक नया ‘नौजवान वर्ग’ उभर रहा है, जो गर्व से खुद को एग्री-प्रेन्योर कहता है, जो खेत को सिर्फ उत्पादन का नहीं बल्कि नवाचार और ब्रांड का केंद्र बना रहा है। अगर यकीन न आए तो पुणे के पास रहने वाले अमूल देशमुख (बदला हुआ नाम) की कहानी सुनिए। एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर अमूल सालाना 25 लाख रुपये का पैकेज पा रहे थे, इसके बावजूद उन्हें अपने काम में किसी तरह का सुख या रोमांच नहीं हासिल हुआ। 2018 में उन्होंने नौकरी छोड़कर अपने पैतृक गांव में तीन एकड़ जमीन पर ऑर्गनिक फार्मिंग शुरु की और आज उनका यह प्रयोग एक बेहतरीन सक्सेज स्टोरी का उदाहरण है। हालांकि शुरुआत आसान नहीं थी, पहले साल उन्हें करीबन 7 लाख का घाटा हुआ, परिवार बेहद चिंतित हुआ बल्कि कहना चाहिए डर गया लेकिन अमूल ने हार नहीं मानी और परिवार को भी अपने विश्वास में ले लिया। अगले साल खेती करने के लिए उन्होंने जिन नई तकनीकों का इस्तेमाल शुरु किया, मसलन ड्रिप इरिगेशन, पॉलीहाउस तकनीक, डायरेक्ट टू कस्टमर मॉडल। इन तीनों प्रयोग से धीरे-धीरे करके सफलता की ओर कदम बढ़ चले। आज वे पुणे शहर के 200 से ज्यादा उच्च-मध्य घरों में हर दिन बिना केमिकल की शुद्ध और ताजी सब्जियां सप्लायी करते हैं और उनकी सालाना कमाई 45 से 50 लाख रुपये तक पहुंच गई है और इस सबके बीच इनके लिए संतोष की सबसे बड़ी बात ये है कि अब वह किसी कंपनी के नौकर नहीं हैं, अपने आप के नौकर हैं।
ऐसी ही कुछ शानदार सक्सेज स्टोरी बेंगलुरु की प्रिया नायर की भी है (यह इनका भी परिवर्तित नाम है)। प्रिया ने 2020 में लॉक डाउन के समय एक सफल स्टार्टअप में मार्केटिंग हेड थीं। फिर उन्होंने ही अपने शहर में हाइड्रोपोनिक्स फार्मिंग शुरू की, जहां बिना मिट्टी के पौधे उगाये जाते हैं। इसकी शुरुआत एक छोटे से गोदाम से हुई लेकिन आज उनकी कंपनी माइक्रोग्रीन्स, एग्जोटिक लेट्स तथा केले और हर्ब्स की खेती करके उन्हें सीधे बेंगलुरु के कुछ रेस्त्रां और सुपर मार्केट में पहुंचाते हैं। प्रिया का कहना है पहले वह कार्पोरेट दुनिया में एक ब्रांड बना रही थीं और अब अपनी मर्जी से खेती में जिंदगी उगा रही हैं। हाल के सालों में खेती में हुए एक से एक नवाचारों की सक्सेज स्टोरी सिर्फ दक्षिण या पश्चिम के राज्यों तक ही केंद्रित नहीं है। पंजाब जहां हरितक्रांति की शुरुआत हुई थी, आज वहां भी अनेक ऐसे इंटरप्रिन्योर जन्म ले चुके हैं, जो नई सदी के पहले कृषि इंटरप्रिन्योर में से हैं और डायवर्सिफिकेशन की क्रांति कर रहे हैं। आज पंजाब में नई कृषि क्रांति से सफलता की कहानी लिखने वालों में से लुधियाना के गुरुप्रीत सिंह (बदला हुआ नाम) भी शामिल हैं, जो अभी कुछ सालों पहले तक कनाडा में पढ़ रहे थे और यह सोचकर कनाडा पढ़ने गये थे कि वहीं के स्थानीय नागरिक बन जाएंगे। लेकिन उन्हें खेती की दुनिया में हो रही सुगबुगाहट ने वापस देश ला दिया और आज वह ऑर्गनिक फल और सब्जियां उगाकर तथा व्यवस्थित तरीके से मधमुक्खी पालन करके शहद का उत्पादन कर सचमुच अपने खेतों की मिट्टी से सोना उगा रहे हैं। गुरुप्रीत सिंह ने सोशल मीडिया के जरिये अपनी ब्रांडिंग की है और उनके उत्पाद ‘केमिकल फ्री’ टैग के साथ प्रीमियम कीमत पर बिकते हैं। कनाडा में उनको जो सबसे आकर्षक पैकेज ऑफर हुआ था, आज वो उससे दोगुना ज्यादा कमा रहे हैं।
लेकिन सबसे शानदार कहानी तो बिहार के गांव में रहकर ग्लोबल सोच के राहुल कुमार (इनका भी नाम बदला हुआ है) की है। बिहार के गया जिले के राहुल कुमार दिल्ली में नौकरी करते थे। कोविड के दौरान वह गांव लौटे और वहीं रहने का फैसला कर लिया। उन्होंने मशरूम की खेती शुरु की, कम जमीन, कम निवेश और तेजी से उत्पादन के लिए उन्होंने तरक्की की सीढ़ियां बहुत तेज कदमों से चढ़ीं। शुरुआत में उन्होंने ये सारा यू-ट्यूब से देखा, फिर व्यवस्थित ट्रेनिंग ली और आज 1.5 से 2 लाख रुपये महीने का कमा रहे हैं। यही नहीं, वह अपने इस प्रयास से गांव के 12 से 17 युवाओं को लगातार रोजगार दे रहे हैं यानी वह गांव में सिर्फ अपने लिए रोजगार नहीं पैदा किया बल्कि 15 से 17 दूसरे लोगों के लिए भी पैदा किया। ये सक्सेज स्टोरीज बता रही हैं कि किस तरह नई तकनीक, नई सोच, नया निवेश और नये तरीके से खेती के प्रबंधन ने शानदार सफलता की कथाएं लिखीं। खासकर उन युवाओं ने जिन्हें किसी के अंदर काम नहीं करना था, वे स्वतंत्रता चाहते थे। वे प्रकृति के करीब रहना चाहते थे और कुछ अपना बनाना चाहते थे। आज का किसान सिर्फ खेती के काम के नाम पर खेत में हल नहीं चला रहा, वह मार्केट भी अपने इशारों पर नचा रहा है। वह न केवल किसी सफल ब्रांड के साथ जुड़ा है बल्कि खुद भी अपने आपमें एक ब्रांड है और सबसे बड़ी बात ये है कि ये नया किसान, नई टेक्नोलॉजी के साथ नई-नई कहानियां लिख रहा है। इसे मार्केट की समझ है, यह ब्रांड की वैल्यू समझता है और यह मानता है कि तकनीक से ही सफलता की चौंकाने वाली कहानियां लिखी जा सकती हैं।
हालांकि अभी यह शुरुआती दौर ही है और कई तरह की चुनौतियां अभी बाकी हैं। मसलन मौसम परिवर्तन का अभी स्थायी काट समझ में नहीं आ रहा। आज भी बाजार की अनिश्चितता परेशान कर रही है और जल संकट तो है ही। लेकिन फर्क ये है कि अब किसान इनसे डर नहीं रहा बल्कि इन्हें समझकर इनके अनुकूल नई रणनीतियां बना रहा है, क्योंकि ये नये जमाने का जो तकनीक प्रिय और पढ़ा-लिख किसान है, वह यह कर सकता है।
लब्बोलुआब यह है कि भारत में खेती अब बिल्कुल एक नये दौर में प्रवेश कर चुकी है और यह नया दौर सिर्फ तकनीक या कमाई का दौर नहीं है बल्कि नई सोच और नये बदलाव का भी दौर है। जब एक आईटी इंजीनियर, एक मार्केटिंग प्रोफेशनल और एनआरआई छात्र तथा एक साधारण युवक, सब अपने-अपने तर्कों और अपने-अपने सपनों के साथ खेती को चुनते हैं। इससे यह साफ पता चलता है कि अब खेती कुछ न कर सकने वालों की जीविका नहीं है बल्कि बहुत महत्वाकांक्षी सपने देखने वालों की भी बड़ी उम्मीद है। शायद यही वजह है कि आज खेती की तरफ लौटना किसी तरह की हिचकिचाहट का सबब नहीं है बल्कि यह एक ऐसी वापसी है, जहां लौटने वालों को 100 फीसदी इस बात की उम्मीद है कि धीरे-धीरे ही सही खेती के लिए अब अच्छे दिन आ गये हैं।
तेजी से बदल रही है खेती की दुनिया