भारत की आत्मा गांवों में बसती है यह वाक्य अपने बड़ों से हमने दशकों से सुना है। लेकिन अगर आज के भारत की वास्तविकता देखें तो यह आत्मा लगातार उपेक्षा, असमानता और असुरक्षा के बोझ तले दबती जा रही है। गांवों की बुनियादी जरूरतें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य सुविधाएं, स्थायी बिजली और बेहतर सड़क व रेल संपर्क आज भी अधूरी हैं। जिस देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा ग्रामीण भारत और कृषि पर टिका हो, वहां यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि नीति-निर्माण की गंभीर कमी का संकेत देती है।
सबसे बड़ा संकट उस वर्ग का है जिसे हम सम्मान से “अन्नदाता” किसान कहते हैं। भारत में खेती केवल एक पेशा नहीं बल्कि एक जीवन-प्रणाली है जिसमें किसान साल के 365 दिन, सप्ताह के सातों दिन काम करता है। लेकिन इस अथक श्रम के बदले उसे जो आर्थिक सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए, वह अक्सर उसे नहीं मिलता। किसान अपनी पूरी ऊर्जा, समय और संसाधन खेतों और खलिहानों में झोंक देता है। इसी कारण वह अपने बच्चों की शिक्षा, परिवार के स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाता।
विडंबना यह है कि फसल उगाने की पूरी प्रक्रिया में किसान का पैसा, मेहनत और जोखिम सबसे अधिक होता है, लेकिन कमाल की बात यह है कि लाभ की सबसे छोटी हिस्सेदारी उसी को मिलती है और कई बार तो वह भी नसीब नहीं होती, फ़सल की उत्पादन लागत बढ़ती रहती है बीज, खाद, कीटनाशक, डीज़ल, बिजली, सिंचाई और मजदूरी सब महंगे होते जा रहे हैं जबकि फसल का मूल्य अक्सर लागत से थोड़ा ही ऊपर नीचे रहता है। यही कारण है कि किसान लगातार आर्थिक दबाव में रहता है।
इस आर्थिक और सामाजिक दबाव का असर अब ग्रामीण जीवन की परंपरागत संरचनाओं पर भी दिखाई देने लगा है। पशुपालन, जो कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता था, तेजी से घट रहा है। नई पीढ़ी के शिक्षित युवाओं ने भैंस और गाय पालने से दूरी बनानी शुरू कर दी है। इसका सीधा असर दूध और दुग्ध उत्पादों की उपलब्धता पर पड़ रहा है, जो बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के पोषण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ-साथ देश की पोषण सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है।
किसानों की सबसे बड़ी पीड़ा केवल आर्थिक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक भी है। कई किसान महसूस करते हैं कि उन्हें बार-बार वादों और नारों के माध्यम से आश्वासन दिया जाता है, लेकिन नीतियों के स्तर पर उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होता। परिणामस्वरूप खेती से जुड़े समुदाय में एक गहरी निराशा और अलगाव की भावना पैदा हुई है।
किसान आंदोलनों के दौरान देश ने जिस तरह की कटुता और आरोप-प्रत्यारोप देखे, उसने इस दूरी को और बढ़ा दिया। लोकतंत्र में असहमति और संवाद दोनों जरूरी हैं, लेकिन जब किसी समुदाय को अपमानित या संदिग्ध बताया जाता है, तो यह सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है। किसानों के साथ संवाद और सम्मानजनक व्यवहार किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
सवाल यह है कि किसानों की समस्याओं का समाधान का रास्ता क्या है? मेरे विचार से किसानों की समस्याओं का समाधान केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि ठोस नीतिगत सुधारों से संभव है। जैसे पहला, ग्रामीण बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा। गांवों में बेहतर स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, बिजली और सड़क-रेल संपर्क सुनिश्चित किए बिना ग्रामीण भारत का विकास संभव नहीं है।
दूसरा, किसानों को उनकी उपज का न्यायसंगत और लाभकारी मूल्य मिलना चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि किसान को बाजार की अनिश्चितताओं से सुरक्षा मिल सके। तीसरा, कृषि को केवल खेती तक सीमित न रखकर कृषि-आधारित उद्योगों और पशुपालन को प्रोत्साहन देना होगा। डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण और ग्रामीण उद्यमिता के माध्यम से किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत तैयार किए जा सकते हैं।
चौथा, किसानों के लिए सामाजिक सुरक्षा का मजबूत ढांचा आवश्यक है कि जिसमें स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और आपदा-सहायता शामिल हो। इससे किसान परिवारों को भविष्य की अनिश्चितताओं से सुरक्षा मिल सकेगी। पांचवां, सरकार और किसानों के बीच संवाद की स्थायी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए। नीति-निर्माण में किसानों के संगठनों और विशेषज्ञों की भागीदारी बढ़ाने से निर्णय अधिक व्यावहारिक और स्वीकार्य बनेंगे।
बहरहाल, भारत के किसान केवल खाद्य उत्पादन का स्रोत नहीं हैं; वे देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संरचना का आधार हैं। यदि गांव कमजोर होंगे तो शहर भी सुरक्षित नहीं रह सकते, और यदि किसान असुरक्षित होगा तो देश की खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए समय की मांग है कि किसान को केवल चुनावी भाषणों में सम्मान देने के बजाय नीतियों और संसाधनों में प्राथमिकता दी जाए। ग्रामीण भारत को मजबूत बनाना केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व भी है। जब तक अन्नदाता सुरक्षित, सम्मानित और समृद्ध नहीं होगा, तब तक भारत की प्रगति अधूरी ही रहेगी।