भारत सरकार के अनुमानों के अनुसार, कीट और रोग हर साल भारत में फसलों का 10–35 प्रतिशत नष्ट कर देते हैं और गंभीर प्रकोप के दौरान नुकसान इससे भी अधिक होता है। इन चुनौतियों के बावजूद भारत वैश्विक स्तर पर प्रति हेक्टेयर कीटनाशकों का सबसे कम उपयोग करने वाले देशों में से एक है। भारतीय किसान आमतौर पर 0.3–0.6 किलोग्राम कीटनाशक प्रति हेक्टेयर लगाते हैं, जबकि कई यूरोपीय देशों में यह 2–4 किलोग्राम, चीन में लगभग 13 किलोग्राम और पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों में 10 किलोग्राम से अधिक है।
क्रॉपलाइफ इंडिया के महासचिव दुर्गेश चंद्रा ने कहा, “इस व्याख्या का उद्देश्य कीटनाशकों के आसपास अधिक संतुलित और प्रमाण-आधारित बातचीत को प्रोत्साहित करना है। फसल संरक्षण उत्पाद कीटों और रोगों से फसलों की रक्षा करने और किसानों को उपज सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।”
संगठन ने नोट किया कि भ्रांतियां—जैसे कि कीटनाशकों का व्यापक रूप से अत्यधिक उपयोग या अनियमित होना—अक्सर भारत के तुलनात्मक रूप से कम उपयोग स्तरों और उत्पाद मूल्यांकन एवं अनुमोदन की संरचित प्रणाली को नजरअंदाज कर देती हैं। मिथक-बनाम-तथ्य वाली यह व्याख्या कीटनाशक सुरक्षा, अवशेष प्रबंधन, पर्यावरणीय प्रभाव और नियामक नियंत्रणों से संबंधित प्रमुख मुद्दों को स्पष्ट करने का प्रयास करती है, जो वैज्ञानिक प्रमाणों और आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है।
मिथक: कीटनाशक कैंसर का कारण बनते हैं।
तथ्य: भारत में हर कीटनाशक को इस्तेमाल से पहले सरकार सख्ती से जांचती है। केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति (सीआईबी एंड आरसी) स्वास्थ्य जोखिम, पर्यावरण प्रभाव और खाद्य अवशेषों की जांच करती है। सही लेबल निर्देशों और तय सीमा में इस्तेमाल करने पर उपभोक्ताओं में कैंसर का जोखिम नहीं बढ़ता। किसानों को लेबल पढ़ना, सुरक्षा उपकरण (मास्क, दस्ताने) पहनना और ट्रेनिंग लेनी चाहिए – इससे जोखिम बहुत कम हो जाता है।
मिथक: कीटनाशक कभी खत्म नहीं होते।
तथ्य: आजकल के ज्यादातर कीटनाशक मिट्टी और पानी में जल्दी टूट जाते हैं। यह उत्पाद, मिट्टी की स्थिति और मौसम पर निर्भर करता है। लेबल पर सही मात्रा और कटाई से पहले प्रतीक्षा अवधि साफ लिखी होती है।
मिथक: सारे कीटनाशक शुद्ध जहर हैं।
तथ्य: हर उत्पाद की विषाक्तता अलग-अलग होती है। सबकी अलग जांच होती है और अलग सुरक्षा श्रेणी में रखा जाता है। लेबल पर सुरक्षित मात्रा, इस्तेमाल का तरीका और इंतजार समय स्पष्ट लिखा रहता है।
मिथक: जैविक खेती में कोई केमिकल नहीं होता।
तथ्य: जैविक खेती में भी कुछ अनुमोदित कीटनाशक इस्तेमाल होते हैं – जैसे नीम का अर्क और पाइरेथ्रम। प्राकृतिक हो या सिंथेटिक, दोनों को सुरक्षा जांच पास करनी पड़ती है।
मिथक: कीटनाशक अच्छे कीड़ों को मार देते हैं।
तथ्य: अब किसान समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) अपनाते हैं – जिसमें जैविक नियंत्रण, निगरानी और जरूरत पड़ने पर ही लक्षित कीटनाशक। सही समय और मात्रा में इस्तेमाल करने पर मधुमक्खी और फायदेमंद कीड़ों को कम नुकसान होता है।
मिथक: खाने में रसायन बचे तो खतरा है।
तथ्य: भारत का खाद्य नियामक (एफएसएसएआई) अधिकतम अवशेष सीमा (एमआरएल) तय करता है। 2022-2025 में 86,000 से ज्यादा खाद्य सैंपल जांचे गए – लगभग 97 प्रतिशत सीमा के अंदर मिले। धोने, छीलने और पकाने से अवशेष और कम हो जाते हैं।
मिथक: भूजल पूरी तरह खराब हो जाएगा।
तथ्य: पर्यावरण पर असर ज्यादातर इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करता है। कई कीटनाशक मिट्टी से मजबूती से जुड़ जाते हैं, भूजल तक नहीं पहुंचते। ज्यादा मात्रा या गलत इस्तेमाल से ही समस्या होती है।
मिथक: बिना कीटनाशक के खेती हो सकती है।
तथ्य: फसल संरक्षण के बिना कीट प्रकोप से 30-50 प्रतिशत तक उपज खराब हो सकती है। इससे किसानों की कमाई घटती है और देश की खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है।
मिथक: किसान कीटनाशकों से जहर खा जाते हैं।
तथ्य: सुरक्षित इस्तेमाल जरूरी है। सुरक्षा उपकरण, उचित ट्रेनिंग और लेबल के अनुसार इस्तेमाल से जोखिम बहुत कम हो जाता है।
मिथक: उद्योग सच्चाई छुपाता है।
तथ्य: मंजूरी के लिए कंपनियां स्वास्थ्य, पर्यावरण और अवशेषों पर पूरी जानकारी देती हैं। नियामक सब जांच के बाद ही उत्पाद को हरी झंडी देते हैं। यह स्पष्टीकरण किसानों की वास्तविक चुनौतियों को समझते हुए जिम्मेदार फसल संरक्षण को बढ़ावा देने की कोशिश है।