रामफल भारत का ऐसा फल है, जिसकी खेती भले अभी बड़े पैमाने पर न होती हो, लेकिन पिछले एक दशक में जिस तरह इसकी मांग बढ़ी है, उसे देखते हुए यह किसानों की आर्थिक आय बढ़ाने के लिए यह एक बेहतर विकल्प हो सकता है। रामफल और सीताफल दोनो अलग-अलग फल होते हैं, इन्हें एक ही न समझ लें। हां, ये एक ही परिवार के होते हैं। रामफल आकार में बड़ा लाल या भूरे रंग का तथा अधिक मुलायम गूदे वाला होता है। भारत में रामफल का पेड़ महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के कुछ भागों मंे, कनार्टक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, बंगाल और बिहार में पाया जाता है। रामफल सेहत के लिए बहुत गुणकारी होता है। इसमें विटामिन सी, विटामिन ए और भरपूर मात्रा में डाइटरी फाइबर होता है। यह अत्यंत पाचक, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में विशिष्ट तथा दिल को स्वस्थ रखने मंे अत्यंत मददगार है। क्यांेकि इसमें दिल के स्वास्थ्य के लिए जरूरी पोटेशियम और मैग्नीशियम पाये जाते हैं, जो इंसान के रक्तचाप को नियंत्रित रखते हैं।
चूंकि इसमें एंटीआॅक्सीडेंट गुण भी होते हैं, इसलिए यह त्वचा और बालों के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत अच्छा होता है। किसानों के लिए यह अतिरिक्त रूप से फायदेमंद इसलिए है, क्योंकि हाल के सालों में इसकी मांग काफी ज्यादा बढ़ी है और यह बाजार में 50 रुपये से लेकर 100 रुपये प्रतिकिलो तक बिक जाता है। इसलिए यदि किसान एक हेक्टेयर में रामफल का पेड़ लगा लें, तो यह हर साल 12 से 20 टन तक का आसानी से उत्पादन दे सकता है और गिरी से गिरी हालत में 8 लाख से 16 लाख रुपये तक की कमाई हो सकती है। हालांकि वास्तविक लाभ, उत्पादन लागत, स्थानीय बाजार और फल की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। फिर भी इस पेड़ में किसानों के लिए इसलिए जबर्दस्त आर्थिक संभावनाएं हैं, क्योंकि इसकी मांग दिनोंदिन बढ़ रही है। साथ ही फल आधारित प्रसंस्करण उद्योग में भी इसकी मांग तेजी से बढ़ी है।
रामफल का वैज्ञानिक नाम ‘एनोना रेटीकुल्टा’ है, अंग्रेजी नाम ‘बुलक्स हार्ट’ और ‘कस्टर्ड एप्पल ट्री’ है। इसका परिवार एनोनासी है। इसकी प्रकृति पर्णपाती छोटा फलदार वृक्ष है। आमतौर पर इसकी ऊंचाई 5 से 10 मीटर होती है और जहां तक रामफल के पेड़ के जीवन का सवाल है तो यह 25 से 40 वर्ष तक का होता है। रामफल पेड़ के लिए 25 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उपयुक्त होता है। 700 से लेकर 1200 मिलीलीटर तक की वर्षा उपयुक्त होती है। जहां तक मिट्टी का सवाल है तो यह दोमट, पथरीली, लाल और जलनिकास वाली मिट्टी में आसानी से फलता-फूलता है। कुल मिलाकर यह कम उपजाऊ वाली जमीन में भी आसानी से हो जाता है। जहां तक इसकी खेती करने की बात है तो यह नर्सरी से लिये गये ग्राफ्टिंग पौधे को लगाने पर तीन से चार साल के बीच फल देना शुरु कर देता है और पूर्ण उत्पादन छह से सात सालों में होता है। एक वृक्ष औसतन 60 से 100 किलोग्राम तक फल देता है।
अगर यह बात जाननी हो कि हर गुजरते साल के साथ इसकी मांग बाजार में क्यों बढ़ रही है, तो इसका कारण है लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता। दरअसल रामफल विटामिन सी, विटामिन बी6, पोटेशियम, मैग्नीशियम, फाइबर आदि से भरपूर होता है, इसलिए इन दिनों स्वास्थ्य के प्रति जागरुक लोगों के बीच इसकी बेहद मांग है। लेकिन यह किसानों के लिए आर्थिक रूप से शानदार तब है, जब किसान बाजार और प्रसंस्करण पर ज्यादा ध्यान दें। क्योंकि यह कम लागत में आराम से हो जाता है। इसे कम सिंचाई की जरूरत पड़ती है और उर्वरक भी इसे कम चाहिए होता है। इसी तरह दूसरे पेड़ों के मुकाबले इसे कीटनाशक भी कम चाहिए होते हैं। इसलिए रामफल के पेड़ में लागत कम आती है और आम, कटहल तथा इसी तरह के दूसरे फलों के मुकाबले यह जल्दी फल देने लगता है। लेकिन किसानों को सबसे ज्यादा लाभ तब हो सकता है, जब वह इसके प्रसंस्करण पर ध्यान दें, जैसे- इसका पल्प अच्छी कीमत में बिकता है, आइस्क्रीम, शेक, जैम, जैली, मिठाईयां और फ्लेवर्ड दही में यह खूब इस्तेमाल होता है। इस तरह प्रसंस्करण के बाद इसका मूल्य कई गुना बढ़ जाता है।
किसान इसकी स्मार्ट तरीके से खेती करके भी लाभ कमा सकते हैं यानी इसकी मिश्रित खेती करें। रामफल के साथ अमरुद, नींबू और सहजन की भी खेती की जाए तो यह दोहरे-तेहरे लाभ का जरिया बन सकता है और हां, बिल्कुल शुरुआती वर्षों में जहां इसे लगाया जाता है, वहां मूंग, उड़द और सब्जियों की खेती भी की जा सकती है। लेकिन इसकी व्यावसायिक फसल लेने के लिए कुछ चुनौतियों के लिए भी तैयार रहना चाहिए। यह फल जल्दी पकता है और पककर जल्दी खराब हो सकता है।
इसलिए इसके उत्पादन के आसपास अगर कोल्ड चेन नहीं है, तो मुश्किल होती है। फिर इसके तेज विपणन की व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि अभी इसका बाजार आम या अमरुद जैसा लोकप्रिय नहीं है, इसलिए इसे बेचने में खुद भी प्रयास करने होंगे। हां, जब भी व्यावसायिक रूप से लाभ पाने के लिए रामफल के पौधे लगाएं तो उच्च गुणवत्ता वाले कलमी पौधे ही लगाएं। बीज वाले पौधे काफी दिनों के बाद तैयार होते हैं और कई बार फसल भी बेहतर नहीं देते।