आज के समय में अधिकांश शहरों और कस्बों में लोगों के पास बागवानी का शौक तो है, लेकिन जगह की कमी सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। छोटी बालकनी, छत का सीमित हिस्सा या कुछ गमले ही उपलब्ध होते हैं। ऐसे में यदि एक ही गमले से दो या तीन प्रकार की सब्जियां और मसाले उगाए जा सकें, तो यह किसी बोनस से कम नहीं। यही है कम्पेनियन प्लांटिंग और इंटरक्रॉपिंग की तकनीक, जिसे अब किचन गार्डनिंग की दुनिया में तेजी से अपनाया जा रहा है।
यह तकनीक केवल जगह बचाने का तरीका नहीं है, बल्कि पौधों की प्राकृतिक जरूरतों को समझकर उन्हें इस तरह साथ लगाया जाता है कि वे एक-दूसरे की वृद्धि में मदद करें। कुछ पौधे मिट्टी को बेहतर बनाते हैं, कुछ कीटों को दूर रखते हैं, जबकि कुछ कम धूप या कम जगह में भी आसानी से विकसित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप एक गमला छोटे से जैविक पारिस्थितिकी तंत्र में बदल जाता है।अगस्त का महीना इस तकनीक को अपनाने के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। मानसून के कारण मिट्टी में पर्याप्त नमी रहती है और पौधों की बढ़वार भी तेज होती है। यदि इस समय सही योजना के साथ पौधे लगाए जाएं तो अगले दो-तीन महीनों तक घर की रसोई में ताजी और जैविक सब्जियों की आपूर्ति बनी रह सकती है।
सबसे लोकप्रिय संयोजन है टमाटर, तुलसी और धनिया। बड़े गमले के बीच में टमाटर का पौधा लगाया जाता है। उसके आसपास तुलसी और किनारों पर धनिया बो दिया जाता है। तुलसी की सुगंध कई हानिकारक कीटों को दूर रखने में मदद करती है, जबकि धनिया कम जगह में तेजी से तैयार हो जाता है। इस तरह एक ही गमले से तीन उपयोगी फसलें मिलती हैं। इसी तरह बैंगन, पालक और हरा प्याज का संयोजन भी काफी सफल माना जाता है। बैंगन ऊपर की ओर बढ़ता है, पालक जमीन की सतह को ढककर नमी बनाए रखता है और हरा प्याज किनारों पर आसानी से उग जाता है। इससे मिट्टी जल्दी सूखती भी नहीं और खरपतवार भी कम निकलते हैं। यदि आपके पास बेल वाली सब्जियों के लिए थोड़ा सहारा उपलब्ध है, तो लौकी या खीरे के साथ मेथी और धनिया भी लगाया जा सकता है। बेल ऊपर चढ़ जाती है, जबकि नीचे की जगह का उपयोग पत्तेदार सब्जियां कर लेती हैं। इससे एक गमले का पूरा उपयोग हो जाता है।
कम्पेनियन प्लांटिंग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता कम पड़ती है। उदाहरण के लिए गेंदा, तुलसी, पुदीना या लेमनग्रास जैसे पौधों की गंध कई हानिकारक कीटों को दूर रखती है। यदि इन्हें सब्जियों के साथ लगाया जाए तो पौधे अधिक स्वस्थ रहते हैं।
हालांकि इस तकनीक में कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं। ऐसे पौधों को साथ नहीं लगाना चाहिए जिनकी पोषक तत्वों की मांग एक जैसी हो या जिनकी जड़ें बहुत फैलती हों। उदाहरण के लिए आलू और टमाटर एक ही परिवार के पौधे हैं और समान रोगों से प्रभावित होते हैं, इसलिए इन्हें एक ही गमले में लगाने से बचना चाहिए।
गमले का चयन भी महत्वपूर्ण है। कम से कम 16 से 18 इंच चैड़ा और गहरा गमला इस तकनीक के लिए उपयुक्त रहता है। मिट्टी में लगभग 40 प्रतिशत बगीचे की मिट्टी, 30 प्रतिशत अच्छी कम्पोस्ट, 20 प्रतिशत कोकोपीट और 10 प्रतिशत रेत मिलाने से पौधों को पर्याप्त पोषण और जल निकास मिलता है।
अगस्त में बारिश के कारण जलभराव की संभावना रहती है। इसलिए गमले के नीचे पर्याप्त छेद होना आवश्यक है। अतिरिक्त पानी निकलता रहे, अन्यथा जड़ों में सड़न लग सकती है। साथ ही सप्ताह में एक बार नीम खली या वर्मी कम्पोस्ट की हल्की मात्रा देने से पौधों की बढ़वार बेहतर होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एक परिवार केवल 8-10 बड़े गमलों में वैज्ञानिक तरीके से कम्पेनियन प्लांटिंग अपनाए, तो वर्ष के अधिकांश समय धनिया, पालक, मेथी, हरी मिर्च, टमाटर, तुलसी और कई अन्य सब्जियों की घरेलू जरूरत आसानी से पूरी हो सकती है। इससे बाजार पर निर्भरता कम होती है और रसोई तक ताजा, रसायन-मुक्त भोजन पहुंचता है।
आज जब शहरी जीवन में जगह लगातार सिमट रही है, तब एक गमला तीन फसलें जैसी तकनीक केवल बागवानी का प्रयोग नहीं, बल्कि टिकाऊ जीवनशैली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। थोड़ी-सी समझदारी, सही पौधों का चयन और नियमित देखभाल आपको सीमित स्थान में भी भरपूर हरियाली और स्वस्थ भोजन दे सकती है। n