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पेड़ पुराण


पेड़ पुराण


Posted By: Ameeta  |  Posted Date: 02-10-2025

   भारतीय खेती में सबसे बड़ी चुनौती है, एक निश्चित और स्थिर आय। कभी मौसम मार देता है, कभी बाजार किसानों के खिलाफ चला जाता है। ऐसे समय में उन्हें एक ऐसी आय की जरूरत होती है, जो भले कम हो, लेकिन स्थिर और नियमित हो। हरड़ का पेड़ इसी कमी को पूरा करता है। यह किसानों के लिए धीमी लेकिन स्थिर आय का स्रोत है। यह हरड़ का पेड़ एक ऐसा पेड़ है, जो न सिर्फ आय देता है बल्कि पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी सुधार और स्वास्थ्य उद्योग आदि सबमें अपनी तरह का सकारात्मक योगदान देता है। यदि किसान हरड़ या हरितकी का पेड़ लगाते हैं, तो यह सही मायनों में उनकी आर्थिक सुरक्षा का प्राथमिक बीमा साबित होता है। बस इसके लिए धैर्य और शुरुआती मेहनत की जरूरत होती है।

   हरड़ के पेड़ का वैज्ञानिक नाम ‘टर्मिनलिया चेबुला’ है। यह एक मझोले आकार का करीब 15 से 30 मीटर तक की ऊंचाई वाला पर्णपाती पेड़ है, जिसकी अगर सही तरीके से देखरेख की जाए, तो यह 70 से 100 साल तक जीवित रहता है। आयुर्वेद में इस पेड़ का विशेष स्थान है, इसीलिए इसे औषधियों का खजाना भी कहा गया है। आयुर्वेद के सबसे महत्वपूर्ण औषधीय योग में से एक त्रिफला का यह मुख्य घटक है। यही कारण है कि हरड़ की मांग केवल खेती तक सीमित नहीं बल्कि स्वास्थ्य और हर्बल उद्योग में भी इसकी जबर्दस्त मांग है। भारत में हरड़ का पेड़ लगभग हर जगह प्राकृतिक रूप से मिलता है, लेकिन विशेषकर यह मध्य प्रेदश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड़, महाराष्ट्र कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्व के राज्यों में पाया जाता है। यह जंगलों में स्वतः उग जाता है, लेकिन देश के अनेक इलाकों में अब इसकी व्यावसायिक खेती भी होने लगी है।

    जहां तक हरड़ के पेड़ के लिए अनुकूल जलवायु और मिट्टी का सवाल है तो यह उष्णकटिबंधीय जलवायु के लिए अनुकूल है, जहां 20 से 35 डिग्री तक तापमान हो। लेकिन वर्षा के मामले में यह 800 मि.लीटर से 1500 मि.लीटर वार्षिक बारिश होने वाले क्षेत्रों में आसानी से उगता और विकसित होता है। जहां तक मिट्टी का सवाल है तो यह दोमट या हल्की पथरीली मिट्टी के लिए ज्यादा उपयुक्त है, जिसका पीएच 5.5 से 7.5 तक हो। इसकी एक खासियत यह भी है कि यह पेड़ सूखा सहन कर लेता है, इसलिए कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी यह आसानी से उग आता है। जहां तक इसके फल और उसमें लगने वाले फूलों का सवाल है तो इसके फूल, छोटे, पीले और सफेद होते हैं। इसमें लगने वाला फल अंडाकार होता है और जब कच्चा होता है तो हरा, लेकिन पकने पर पीला या हल्का भूरा हो जाता है। हरड़ के पेड़ में फल आने में 5 से 7 साल लग जाते हैं और जब एक बार यह अच्छे से फलना शुरु कर देता है, तो एक मझोले किस्म के पेड़ में औसतन 25 से 50 किलो तक फल हर वर्ष लगते हैं। 

    हरड़ का औषधीय महत्व बहुत है, क्योंकि इसके फल में जो तत्व विशेष रूप से पाये जाते हैं। उनमें टेनिन, गैलिक एसिड, एंटीआॅक्सीडेंट आदि होते हैं और इसके फल का मुख्यतः उपयोग कब्ज व गैस संबंधी औषधियों को बनाने में, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में, त्वचा रोगों से मुक्ति पाने में और आजकल के सबसे ज्यादा संक्रामक डायबिटीज और हृदय जैसे बीमारियों में इसका उपयोग खूब होता है। आयुर्वेद और यूनानी के साथ-साथ आधुनिक हर्बल उद्योग में भी इसकी अच्छी खासी मांग है। किसानों के लिए यह विशेष रूप से इसलिए आर्थिक महत्व का पेड़ है, क्योंकि यह उन्हें स्थिर आय प्रदान करता है। जबकि इसके लगाने में कम लागत और देखरेख की भी कम जरूरत पड़ती है। हरड़ का पेड़ उन गिने चुने पेड़ों में से जिन्हें सिंचाई और खाद की कम जरूरत पड़ती है, जबकि इसके फलों की मांग आयुर्वेदिक कंपनियों जैसे पतंजलि, डाबर आदि में हमेशा बनी रहती है। जहां तक हरड़ के पेड़ से कमाई का अनुमान है, तो गुणवत्ता के अनुसार एक मझोले दर्जे का हरड़ का पेड़ हर साल 25 से 50 किलो हरड़ का उत्पादन करता है और बाजार में हरड़ की कीमत इसकी क्वालिटी के मुताबिक 60 से 120 रुपये प्रति किलो तक होती है। 

   इस तरह अगर 100 हरड़ के पेड़ लगा लिए जाएं तो बहुत आसानी से साल में ढाई से पांच लाख रुपये तक की कमाई हो सकती है। जहां तक इसकी कमाई के तरीकों का सवाल है तो हरड़ से कई तरह से आर्थिक लाभ मिलते हैं, सीधे मंडी या हर्बल कंपनियांे को इसका कच्चा फल बेंचकर या फिर इसके फल को सुखाकर कच्चे से तीन से चार गुना कीमत पर बेंचकर अथवा एक प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर इसका चूर्ण, त्रिफला और विभिन्न तरह के आयुर्वेदिक दवाएं बनाकर सूखे फल के मुकाबले भी 300 फीसदी से ज्यादा का लाभ कमाया जा सकता है। सवाल है कि इसे कैसे उगाएं, तो इसे एग्रोफाॅरेस्ट्री माॅडल के तहत उगाया जाता है यानी खेत की मेढ़ या खाली पड़ी जमीन में इसके पेड़ उगाये या लगाये जाते हैं। हरड़ की खेती मिश्रित तरीके से की जाए तो ज्यादा लाभ वाली होती है। मिश्रित का मतलब है हरड़-आंवला-बहेड़ा यानी त्रिफला माॅडल। जहां कम पानी की सुविधा हो और गेहूं या धान पैदा करना मुश्किल हो, वहां हरड़ की खेती बड़ी आसानी से होती है। लेकिन हरड़ की खेती के पहले यह भी जान लें कि कई दूसरी खेती की तरह इसकी भी कुछ बुनियादी चुनौतिया हैं। जैसे हरड़ का पेड़ लगाये जाने के कम से कम 5 से 7 सालों के बाद फल देना शुरु करता है। अतः हरड़ के पेड़ या तो खाली पड़ी जमीन या खेत की मेढ़ों पर लगाएं, इस पर तुरंत फसल देने का दबाव न हो।

   इस पेड़ को लगाने की अन्य बड़ी चुनौतियों में से एक यह भी है कि इसको लगाने के बाद किसानों को शुरुआती सालों में धैर्य दिखाने की जरूरत होती है। क्योंकि यह दीर्घकालिक आय देने वाला पेड़ है, यह जल्दी अमीर बनने का साधन नहीं। अगर आपके पास एक हेक्टेयर जमीन है, जहां आप हरड़ की खेती कर सकते हैं, तो बेहतर होगा कि आप मिश्रित खेती करें यानी 100 पेड़ हरड़ के, 150 पेड़ आंवले के और 100 पेड़ बहेड़ा के लगाएं, ये कुल 350 पेड़ अगर सही से देखरेख की जाए, तो 5 से 7 साल बाद नियमित 10 से 15 लाख रुपये की आमदनी दे सकते हैं। लेकिन पहले 5 से 7 सालों तक यानी जब तक पौधे पूरी तरह बड़े और विकसित नहीं हो जाते, हर साल 1.5 से 1.75 लाख रुपये की सालाना लागत आती है। 

   इसलिए अगर बड़े पैमाने पर और व्यवस्थित ढंग से हरड़, आंवला और बहेड़े की खेती करनी है ही, तो कम से कम 7 से 8 लाख रुपये शुरुआत में निवेश के लिए होना चाहिए। हां, इस दौरान अगर स्मार्ट ढंग से मिश्रित खेती करें, तो हल्दी, अदरक, मूंग, चना और सब्जियों के रूप में हर साल एक से सवा लाख तक की उस खाली जगह में खेती कर सकते हैं, जहां हरड़, बहेड़ा और आंवले की कुल 350 पेड़ लगा रखे हैं। 

   कुल मिलाकर हरड़ का पेड़ भारत में कमजोर आय वाले किसानों के लिए एक स्थिर आय का स्रोत तो है और अगर निवेश के लिए कुछ पैसा हो और अपने उत्पादन में वैल्यू एडिशन करने की भी कोशिश करें, तो हर साल औसतन एक हेक्टेयर जमीन से 10 से 15 लाख रुपये की कमाई भी हो सकती है। जिस तरह आज दुनिया में हर्बल और दूसरी नेचुरल प्रोडक्ट की मांग तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए हरड़ को भविष्य का उपयोगी आर्थिक आय सुनिश्चित करने वाला पेड़ मान सकते हैं और अनिश्चित भारतीय कृषि में किसान अपनी एक निश्चित कमाई के लिए आश्वस्त हो सकते हैं। 

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