E-177, First Floor, Amar Colony, Lajpat Nagar-IV, New Delhi info@missionmeradesh.com
Follow us:
;

Popular Post


ब्लॉग

असंतोष: किसान एकता का स्वर हक और सम्मान की मांग


असंतोष:  किसान एकता का स्वर  हक और सम्मान की मांग


Posted By: Ameeta  |  Posted Date: 02-10-2025

 किसान एक बार फिर सड़कों पर उतरने को तैयार है। राजस्थान में 17 नवंबर को प्रस्तावित “किसान एकता ट्रैक्टर मार्च” केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि किसानों की पीड़ा और असंतोष का प्रतीक है। राजस्थान के किसान आंदोलनों की ऐतिहासिकता राष्ट्रीय स्तर पर चले किसान आंदोलनों जैसे 2020-21 के दिल्ली आंदोलन से जुड़ती रही है, जहां एमएसपी की गारंटी, कर्ज माफी, और अन्य कई मांगें मुख्य विषय रहीं। किसानों की लंबे समय से यह मांग रही है कि उनकी समस्याओं को न सिर्फ सुना जाए, बल्कि नीति-निर्माण में प्राथमिकता मिले। इसको साकार करने के लिए प्रदेश के हजारों किसान अपने ट्रैक्टरों के साथ सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करने की तैयारी कर रहे हैं। ज़ाहिर है कि यह उनके हक़, अधिकार और नीति-सुधार की मांग का सबसे बड़ा प्रदर्शन होगा। दरअसल फसल बीमा योजना, जो किसानों की सुरक्षा कवच बनने की थी, आज असंतोष का कारण बन गई है। चूरू ज़िले में खरीफ 2021 का 500 करोड़ रुपये का बीमा क्लेम निरस्त होना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी पर गहरा प्रहार है। समय पर सर्वे न होना, डाटा एंट्री में लापरवाही, और बीमा कंपनियों की मनमानी ने इस योजना को अविश्वसनीय बना दिया है। सवाल यह उठता है कि जब प्रीमियम वसूलने की तारीख तय है, तो बीमा भुगतान की क्यों नहीं? 

 किसानो का कहना है कि बीमा योजना की एक बड़ी खामी यह है कि खड़ी फसल के नुकसान का समावेश नहीं होता, जो सीधे ज़मीनी नुकसान की अनदेखी है। दूसरे, समय पर सर्वे न होना, डाटा एंट्री की गड़बड़ी, और कंपनियों की मनमानी पूरे तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठाती है, जिससे किसान अपने अधिकार से वंचित रह जाते हैं। खाद-बीज की किल्लत, एमएसपी पर खरीद में गड़बड़ी, मंडियों में टोकन की अव्यवस्था, और बिजली आपूर्ति की बदहाली किसान की परेशानियों की फेहरिस्त लंबी है। डीएपी और यूरिया की कालाबाज़ारी ने स्थिति और विकट कर दी है। कई इलाकों में आज भी घरेलू और कृषि बिजली लाइनें अलग नहीं हुई हैं, जिससे उपकरण जल रहे हैं और लागत बढ़ रही है। जल जीवन मिशन और रेलवे अंडरब्रिज जैसी अधूरी परियोजनाएँ किसानों के लिए एक और परेशानी बन चुकी हैं। क़रीब 500 करोड़ रुपये के बीमा क्लेम के निरस्त होने का सीधा प्रभाव हज़ारों किसानों और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिरता पर पड़ता है। ऐसा सिर्फ एक जिले की बात नहीं, यह पूरे प्रदेश की समस्या है। खाद-बीज और बिजली की समस्याएं उत्पादन लागत बढ़ा रही हैं, जिससे किसान लगातार कर्ज़ के दलदल में फंसता जा रहा है। 

सिंचाई की बिजली दरों और कृषि लाइन की गड़बड़ी, उपकरणों के जलने और विश्वसनीयता में बाधक है इस व्यापक असंतोष के बीच किसानों की मांगें न तो अव्यावहारिक हैं और न ही नई। वे बस वही इंसाफ चाहते हैं जो पड़ोसी राज्यों के किसानों को मिल रहा है, हरियाणा और मध्य प्रदेश की तर्ज पर भावांतर योजना, प्रधानमंत्री धन-धान्य योजना में मूंग व चना को शामिल किया जाना, और सिंचाई के लिए सस्ती बिजली दरें। साथ ही यमुना लिंक समझौते के तहत शेखावाटी को उसका हिस्सा मिले, यह एक न्यायसंगत अपेक्षा है। किसानों का यह मार्च सरकार के सामने एक सीधा और सच्चा सवाल रखता है कि क्या खेती सचमुच प्राथमिकता में है? 

नीतियाँ तभी सार्थक होती हैं जब उनका लाभ खेत तक पहुँचे, बीमा का पैसा किसान के खाते में आए और दिन-रात मेहनत करने वाले अन्नदाता को सम्मान मिले। यह मार्च सिर्फ़ विरोध नहीं, बल्कि नीति सुधार की आवाज़ है जिसे अनसुना करना अब संभव नहीं। किसानों के इस आंदोलन को इलाके के कई बड़े नेता, जैसे चूरू के सांसद राहुल कस्वां, नरेंद्र बुडानिया, पुसाराम गोदारा, कृष्णा पूनिया आदि समर्थन दे रहे हैं, जिससे आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने की शक्ति मिलती है। बहरहाल किसानों की इस समस्या का समाधान करने के लिए किसानों के इन सुझावों सरकार को तत्काल संज्ञान लेने की ज़रूरत है जैसे पहला, फ़सल बीमा भुगतान और सर्वे प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए किसान प्रतिनिधियों की निगरानी में सर्वे होना चाहिए। दूसरा, किसानों के लिए एकीकृत हेल्पलाइन एवं तकनीकी सहायता पोर्टल बनाया जाए, ताकि डाटा एंट्री की गलतियों को तत्काल ठीक किया जा सके। मंडी टोकन और खरीद संबंधी प्रक्रिया को तकनीकी और प्रशासनिक रूप से पारदर्शी और आसान बनाना होगा। जल जीवन मिशन, रेलवे अंडरब्रिज आदि अधूरी परियोजनाओं की समयबद्ध निगरानी के लिए स्वतंत्र लोक निगरानी तंत्र बनाया जाए। सभी कृषि उपजों को एमएसपी दायरे में लाने के लिए राज्य स्तरीय समिति बनाकर केंद्र को सशक्त सिफारिश भेजी जाए। किसानों का ट्रैक्टर मार्च केवल विरोध का नहीं, नीति-संशोधन और सामाजिक न्याय की पुकार है। किसान आंदोलन जब-जब सशक्त आवाज़ में सामने आता है, वह नीतिगत बदलावों की नींव डालता है। सरकार को चाहिए कि बातचीत, पारदर्शिता और भागीदारी के साथ त्वरित, असरदार फैसले लें ताकि किसान को सुरक्षा, सम्मान और न्याय मिले, क्योंकि मजबूत किसान ही मजबूत देश का आधार हैं। 

;