इस बरस राजनीतिक प्रतिबद्धता तथा तकनीक के विवेकपूर्ण उपयोग से 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने की राह में सस्ती, सुलभ और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा- हर जगह, हर समय की जनापेक्षा पूरी की जा सकती है। इसके सकारात्मक संकेत दिखेंगे। हालांकि महंगी चिकित्सा और ग्रामीण-शहरी समानता की कठोर चुनौतियां भी दरपेश रहेंगी। इसलिए 2026 स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए उम्मीदों के साथ इम्तहान का भी साल है।
नया वर्ष 2026 भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए अवसरों के साथ आशंकाओं का भी है। यह साल इस क्षेत्र के लिये निर्णायक मोड़ बनेगा। जनांकिकीय परिवर्तन, तीव्र शहरीकरण, जलवायु संकट, प्रदूषण, सुदूर क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं के पहुंच की कमी, चिकित्सकों, सुदूर क्षेत्रों में विशेषज्ञों, अस्पताल में नर्सों-बिस्तरों, पैरामेडिक की कमी, नकली दवाएं और महंगी चिकित्सा जैसी चुनौतियां एक ओर हैं, तो दूसरी ओर डिजिटल नवाचार, टेलीमेडिसिन, सार्वजनिक स्वास्थ्य मिशनों और सरकार की नई नीतियों के समुचित क्रियान्वयन तथा स्वास्थ्य क्षेत्र का बढ़ता बाजार नए अवसर भी पैदा करेगा। स्वास्थ्य व्यवस्था सब तक पहुंचाने के कुछ ठोस कदमों के असर इस साल दिखेंगे बशर्ते संसाधनों का टोटा खत्म करने को पर्याप्त बजट आवंटन हो। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के लक्ष्य के बावजूद भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय अभी तक जीडीपी के ढाई प्रतिशत तक नहीं पहुंच पाया है। 2026 के बजट में जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक छलांग की अतिरेकी पर विचार होगा। हां, यह व्यय 2 प्रतिशत के आसपास भी पहुंचे तो प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे, मानव संसाधन और दवाओं की उपलब्धता में वास्तविक सुधार संभव है। इससे सेवाओं की पहुंच बढ़ेगी, निजी क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता से उपजा लागत-दबाव कम होगा। जवाब फरवरी के अंत में मिलेगा।
साल 2030 तक 65 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या तेज़ी से बढ़ने और उनके बड़े हिस्से के शहरी क्षेत्रों में रहने के अनुमान के साथ इस साल स्वास्थ्य अवसंरचना पर बढ़ते वृद्धजनों का दबाव दिखेगा। रोग-भार का लगभग 45 फीसद इन्हीं पर केंद्रित होने के चलते 2026 में जेरियाट्रिक देखभाल, घर आधारित दीर्घकालिक देखरेख को बजट और नीतियों का हिस्सा बनाया जा सकता है। स्वास्थ्य सेवाएं सब तक पहुंचाने, उसका दायरा बढ़ाने हेतु सार्वभौमिक स्वास्थ्य सरकार की प्राथमिकताओं में इस साल भी रहेगी। आयुष्मान भारत, हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर और मिशन-मोड कार्यक्रमों का विस्तार 2026 में तेज होने की उम्मीद है। सरकार का फोकस आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन, ई-संजीवनी जैसे डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को जिलास्तरीय अस्पतालों, स्कूल हेल्थ प्रोग्राम और मोबाइल हेल्थ यूनिट, दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों में स्पोक-सेंटर्स के रूप में हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स को इससे जोड़ने तथा जिला स्तर पर क्रिटिकल केयर ब्लॉक, एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ाने पर रहेगा। अपेक्षा है कि इस साल दूरस्थ और जनजातीय इलाकों में मोबाइल क्लिनिक, एआई-आधारित रिमोट डायग्नोस्टिक्स और इसके लिए भाषा-अनुकूल इंटरफेस का भी विस्तार होगा।
स्वास्थ्य में एआई, बिग डेटा और वेयरेबल टेक्नोलॉजी का उपयोग 2026 में अधिक परिपक्व स्तर पर पहुंचेगा। एआई आधारित क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट, रेडियोलॉजी में इमेज एनालिसिस, पैथोलॉजी में स्वचालित रिपोर्टिंग और हाइपरटेंशन जैसे जोखिम कारकों की रिमोट मॉनिटरिंग कॉरपोरेट और बड़े अस्पताल नेटवर्क में आम होती जाएंगी, जबकि सरकारी क्षेत्र में इस साल शुरू होगी। आज 70 प्रतिशत से अधिक स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र देता है, जिससे लागत बढ़ती है। सरकारी सेवा सुलभ हो तो चिकित्सा लागत घटेगी लोगों के जेबों से स्वास्थ्य पर खर्च का बोझ कुछ कम होगा। हालांकि 2026 इस बारे में पूरी तरह आश्वस्त तो नहीं करता। ग्लोबल मेडिकल ट्रेंड रिपोर्ट के अनुसार भारत में चिकित्सा योजना की लागत 2026 में 11.5 फीसद बढ़ने की आशंका है, जो वैश्विक औसत 9.8 प्रतिशत से अधिक है; इसका अर्थ है कि निजी बीमा प्रीमियम, कॉरपोरेट हेल्थ योजनाएं और हॉस्पिटल पैकेज आम नागरिक की आय के मुकाबले महंगे होंगे। सरकार से उम्मीद रहेगी कि इस साल वह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को परिणाम-आधारित बनाए, पैकेज दरों में पारदर्शिता लाए और अनावश्यक प्रक्रियाओं पर लगाम कसे। सिजेरियन डिलीवरी का प्रतिशत निजी अस्पतालों में 50 से ऊपर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन 10-15 फीसद की अनुशंसा करता है- इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार कुछ कदम बढ़ा सकती है।
डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात का ऐतिहासिक असंतुलन, पैरामेडिकल स्टाफ की कमी और बिस्तरों की अपर्याप्तता 2026 में भी स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती बनी रहेगी। ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को जहां विशेषज्ञों की 80 प्रतिशत की कमी है उनको मजबूत किए बिना इन सब का समुचित लाभ मिलना मुश्किल लगता है। नकली और अमानक दवाओं पर दबाव काफी बढ़ा है। 2026 में लेबलिंग, ट्रैक-एंड-ट्रेस, क्यूआर-आधारित सत्यापन और ऑनलाइन फार्मेसी रेगुलेशन को सख़्ती से लागू करने पर जोर रहेगा, इसका असर दिखने की उम्मीद है। लेकिन छोटी-स्तर की अनियमित इकाइयों को नियंत्रित करना चुनौती बनी रहेगी। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के अंतर्गत सरकार ने 25,000 केंद्रों तक विस्तार का लक्ष्य 2026 के अंत तक 22 हजार केंद्रों तक पहुंच सकता है, जिससे किफायती जेनेरिक दवाओं की पहुंच बढ़ेगी, बशर्ते सप्लाई-चेन और गुणवत्ता निगरानी मजबूत रहे। लगभग 21 करोड़ वयस्कों में हाई ब्लड प्रेशर जैसा आंकड़ा स्वास्थ्य तंत्र को 2026 में सामुदायिक स्क्रीनिंग, जन-जागरुकता और जनऔषधि के माध्यम से सस्ते दवा कार्यक्रम पर ज़ोर देने के लिए प्रेरित करेगा।
पोषण, इंद्रधनुष, लक्ष्य जैसे मिशनों के जरिये इस साल मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश में विशेष अभियान चला कर शिशु मृत्यु दर को 20 के नीचे लाने का प्रयास सफल हो सकता है। मातृ-शिशु स्वास्थ्य अभियानों, संस्थागत प्रसव और नवजात देखभाल से 2026 में और सुधार संभव है। टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत 2026 में एआई-समर्थित एक्सरे, सामुदायिक स्क्रीनिंग और पोषण सहायता के विस्तार से उल्लेखनीय प्रगति दर्ज होगी। न्यूरोटेक्नोलॉजी में इसके नैदानिक उपयोग को बढ़ावा देने के नीतिगत प्रयासों से इस साल यह क्षेत्र क्रांतिकारी उपलब्धि दर्ज करा सकता है। एम्स में बना उन्नत ब्रेन स्टेंट ‘सुपरनोवा’ का पहला क्लिनिकल ट्रायल सफल होने के बाद डॉक्टरों का दावा है कि इस देसी स्टेंट से इलाज का खर्च कम आएगा।
हालांकि मानसिक स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा अपर्याप्त ही रहने वाला है। ग्लोबल फूड सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले सिंथेटिक रासायनिक पदार्थ हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़े खतरे हैं। इनका सम्बन्ध कैंसर, इम्यूनिटी की कमजोरी, रिप्रोडक्टिव प्रोब्लम्स, न्यूरो डेवलपमेंट रिस्क से है। लोकप्रिय और मान्य “स्वास्थ्य-ट्रेंड्स” या “डाइट मिथक” वास्तव में हमारी सेहत के लिए मददगार नहीं होते, यह उजागर होने के बाद भारत में स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं की संख्या में वृद्धि हो रही है, जिससे हेल्थ फूड की खरीद में एक संरचनात्मक बदलाव आ रहा है और लोगों का रुझान स्वास्थ्यवर्धक विकल्पों की ओर बढ़ रहा है।
अनुमान है कि 2026 तक स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों पर प्रति व्यक्ति खर्च में 2 गुना वृद्धि होगी। स्वास्थ्य बाजार और मेडिकल टूरिज्म में 2026 में भारत की बढ़त जारी रहने की संभावना है। उन्नत सर्जरी, किफायती इलाज और प्रशिक्षित मानव संसाधन इसकी ताकत हैं। देश के हेल्थकेयर सेक्टर का शानदार प्रदर्शन इस साल भी जारी रहने की उम्मीद है। 2026 में मेडटेक, हॉस्पिटल और फार्मा कंपनियों में तेजी दिखेगी और हेल्थकेयर तथा मेडटेक सेक्टर में 4.5 अरब डॉलर तक का निवेश आ सकता है। भारतीय कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में वित्त वर्ष 2026 में 15 प्रतिशत वृद्धि की संभावना है जिससे यह क्षेत्र इस साल 610 बिलियन डालर तक पहुंच सकता है। यदि 2026 में स्वास्थ्य बजट में यथोचित वृद्धि, राजनीतिक प्रतिबद्धता मानव संसाधन विस्तार, डिजिटल पब्लिक हेल्थ अवसंरचना को मजबूत करने, नकली दवाओं पर सख्ती और गैरसंचारी रोगों को नियंत्रित करने की ठोस रणनीतियां सामने आती हैं, तो 2026 नीति-केंद्रित सुधारों का शुरुआती वर्ष बन सकता है जो आम जन के लिए अधिक विश्वसनीय और संवेदनशील स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा में आशा जगाने वाला साबित होगा।